1.
एक शहर में एक बूढ़ा व्यक्ति प्रतिदिन सड़क के किनारे बैठकर लोगों को एक पुराना आईना दिखाया करता था.जो भी उसमें देखता,अचानक उदास हो जाता था.
लोगों ने अफ़वाह फ़ैला दी कि आईने में कोई जादू है.
एक दिन एक पत्रकार उसके पास कागज कलम ले कर पहुँचा.
उसने आईना देखा,लेकिन उसे अपना चेहरा बिल्कुल सामान्य दिखाई दिया.
वह बोला-“इसमें तो कुछ भी नहीं है.”
बूढ़ा मुस्कुराया और बोला-“ तुम पहले आदमी हो जिसे कुछ भी नहीं दिखा.”
पत्रकार ने पूछा-“ बाकी लोगों को क्या दिखाई देता था.”
बूढ़े ने कहा-“ उन्हें अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना चरित्र दिखाई देता है.”
पत्रकार हँस पड़ा-“ और मुझे.”
बूढ़े ने आईना वापस थैले में रखते हुए कहा-“ तुम्हें अपना चेहरा इसलिए दिखा, क्योंकि तुमने कभी अपना असली चेहरा बनाया ही नहीं.
पत्रकार के हाथ की कलम नीचे गिर गई.
2.
वृद्धाश्रम में रहने वाले दादाजी रोज एक छोटा-सा आईना निकालकर देर तक देखते रहते थे.
एक दिन एक कर्मचारी ने पूछ ही लिया-“ दादाजी, इसमें ऐसा क्या देखते रहते हैं?.”
दादा जी ने मुस्कुराते हुए कहा-“ इसमें मैं अपना चेहरा नहीं, अपना बेटा देखता हूँ.”
कर्मचारी थोड़ा चौंका और उसने कहा- “लेकिन इसमें तो आप ही दिख रहे हैं.”
दादाजी की आँखें नम हो गईं.
हलक को थूक से गीला करते हुए कहा-“ हाँ बेटा, जब वह बहुत छोटा था, तब कहा करता था कि मैं आपके जैसा दिखना चाहता हूँ. मैं रोज इसलिए देखता हूँ कि क्या वह मेरे जैसा बन पाया है अथवा नहीं.”
कर्मचारी ने जानना चाहा-“ और क्या-क्या दिखता है?.
दादाजी ने आईना बंद करते हुए कहा- नहीं.वह मेरे जैसा नहीं बन पाया. उसने अपने पिता को वृद्धाश्रम नहीं छोड़ा.”
3.
बूढ़ा आदमी रोज आईने के सामने खड़ा होकर अपने चेहरे को देर तक देखता था.
एक दिन उसके पोते ने पूछा-“ दादाजी, इसमें रोज आप क्या देखते हैं.?”
बूढ़ा मुस्क्सुराया और बोला-“ मैं उस आदमी को खोजते रहता हूँ जो कभी इसमें रहता था.”
पोता हँस पड़ा.
दादाजी भी हँस पड़े, .पर उनकी आँखें नहीं हँसी .