रेल्वे से सेवानिवृत्त हुए मिश्रा जी रेल्वे-स्टेशन से गुजर रहे थे. कभी उनके इशारे पर ट्रेन चल निकलती थी.
उन्होंने एक कर्मचारी को पास बुलाया और बतलाया-“ बेटा, कभी मै था.”
कर्मचारी ने लापरवाही से जवाब देते हुए कहा-“ जी बहुत अच्छा.” कहकर वह आगे बढ़ गया
खिन्न मन से मिश्राजी आगे बढ़ गए. वे सोचने लगे थे कि उनकी पूरी सेवा,और ईमानदारी बस इतने ही कम शब्दों में
घर लौटे तो पोती दौडकर आई और गले से चिपट गई.” दादाजी आ गए.....दादा जी आ गए.”
अपनी पोती को गले से लगाते हुए उनका दर्द पिघल गया और वे मुस्कुरा उठे
उनकी समझ में आ गया कि पद की पहचान समाप्त हो सकती है,लेकिन प्रेम की पहचान कभी नहीं मिटती