सेवानिवृत्त होने के बाद भी शर्माजी प्रतिदिन बैंक के बाहर लगी बेंच पर बैठ जाते थे.
एक दिन उन्होंने देखा, एक बुजूर्ग महिला फ़ार्म लेकर परेशान खड़ी थी.
उसने एक व्यक्ति से कहा-“भैयाजी, मेरा फ़ार्म भर दो,”
उसने हिकारत से बुढ़िया को घूरकर देखा और आगे बढ़ गया. उसने कई लोगों से गुहार लगाई,लेकिन किसी ने उसकी विनती नहीं सुनी.
बाहर बेंच पर बैठे शर्माजी से उसने कहा-“ भैयाजी, क्या आप मेरा फ़ार्म भर देंगे?”
“ हाँ..हाँ, क्यों नहीं.” कहते हुए उन्होंने फ़ार्म भर दिया.
महिला की आँख भर आई. उसने आभार जताते हुए बोली-“ भगवान आपको खुश रखें.”
शर्मा जी मुस्कुरा दिए.
घर लौटकर उन्होंने उन्होंने अपनी डायरी खोली. काफ़ी समय पूर्व उन्होंने अपना लिखा वाक्य पढ़ा-“ आज पदोन्नति मिली, जीवन सफ़ल हुआ.”
उन्होंने उसे काट दिया और नीचे लिखा-“सचमुच में मैं आज पहली बार किसी के काम आया.”